Tuesday, November 10, 2009

"बाबा श्री अग्रहार नागराज शर्मा जी का परिचय...."



शिविर के बारे में आगे और कुछ कहें उसके पहले मैं आप सभी को बाबा जी के बारे में बताना चाहूंगी।


"बाबा जी की शरीर यात्रा मैसूर प्रान्त (भारत) के एक छोटे से गांव अग्रहार में प्रारम्भ हुई, इसलिए वे हैं ऐ.नागराज। अर्थात अग्रहार उनका परिचय। उनके पिता एवं मामा का कुल इस युग के श्रेष्ठतम वेदज्ञ भारतीय आचार्यों में से हैं। श्री नागराज बाबा जी ने school का मुहँ नहीं देखा।


२२ वर्ष की अवस्था में उन्होंने हम्पा (पम्पापुर) की एक गुफा में श्री विद्या का एक पुरश्चरण किया, उससे जो दिव्य प्रेरणा अवतरित हुई, उससे वे कन्नड़ भाषा के विख्यात कवि हो गए। सारी रात हजारों हज़ार लोग मन्त्र मुग्ध होकर उनको सुना करते थे। उसके पहले अपने गुरुदेव, श्रृंगेरी मठ वे शंकराचार्य, श्री चंद्रशेखर भारती के निर्देश से वे अचानक काशीपुरी चल दिए, वहाँ उन्होंने भगवान् शिव की नगरी में गंगा किनारे स्वावलंबी रहकर तप किया एवं भगवान शिव को सर्व शुभ के रूप में स्वीकारा . वहाँ से लौटकर गुरुदेव के आदेश से उन्होंने वंदनीया माँ से विवाह किया. वे मद्रास में प्रसिद्ध उद्योगपति भी रहे, समाज सेवा, धर्म,राजनीति, गृहस्थ, जीवन और समाज की विसंगतियों का व्यापक अनुभव हुआ।


पर वेदांत का एक प्रश्न-कि मुक्ति के बाद क्या? मुक्ति का प्रयोजन क्या है? उनको मथते रहा. वे महात्मा गाँधी, योगी अरविन्द, महर्षि रमण जैसे दिग्गज लोगों से पूछते रहे, तब भी समाधान नहीं मिला.उनके परिवार में पिछले ७०० वर्षों से कोई न कोई व्यक्ति सन्यास लेकर सत्यानुसंधान में लगा रहा. बाबा ने सोचा कि मुझे अपने प्रश्नों का समाधान स्वयं खोजना चाहिए. वे अपना सारा उद्योग समेटकर माताजी के साथ अनुसन्धान के लिए अमरकंटक की एकांत पहाडियों में आ बसे. आज से लगभग ४६ वर्ष पहले वे निश्चय करके आये थे भीख नहीं मांगेंगे. खाने को नहीं था तो पुराने ऋषियों की तरह लगभग तीन वर्ष पेड़ के पत्ते आदि खाकर रहे. शाम ६ बजे से प्रात: ६ बजे तक, कभी कभी प्रतिदिन १७-१८ घंटे तक वे साधनारत रहे।


सन् १९६६ में उनको वेदान्त का अन्तिमसार निर्विकल्प समाधी का अनुभव हुआ. पर प्रश्न का उत्तर अभी बाकी था. अत: पतंजलि के योग सूत्र में वर्णित सयंम का आकाश में उन्होंने अवधान किया, तब सम्पूर्ण अस्तित्व और समग्र व्यवस्था के सारे सूत्र उनके सामने उजागर हो गए. वे अस्तित्व दृष्टा हुए. अस्तित्व दर्शन, जीवन सार्थक सम्पूर्ण, संतृप्त और पूर्ण जागृत हुआ.दृष्टा पद का साक्षात्कार हुआ. सम्पूर्ण दिशा, कोण, परिप्रेक्ष्य आयाम में समाधान प्राप्त हुआ। वे 'अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन' रूपी समाधान को प्राप्त कर संतृप्त हुए. उन्होंने 'मध्यस्थ दर्शन सह-अस्तित्ववाद' का प्रणयन किया. दस वर्षों तक वे सोचते रहे, परीक्षा करते रहे कि मानवजाति को इसकी जरुरत है कि नहीं. आज की अंतहीन समस्याओं के समाधान के लिए इसको अत्यंत उपयोगी जानकर उन्होंने लोगों से इस दर्शन की चर्चा करना प्रारंभ किया.आज भारत के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक,चिन्तक, समाजसेवी,धार्मिक कार्यकर्त्ता, उनके पुण्यमय संपर्क में है. विदेश से भी वैज्ञानिकों का दल उनसे जीवन और जगत के किसी भी विषय पर विचार विमर्श करने आते हैं.इंजीनियर्स, वनस्पति शास्त्री,चिकित्सक,धर्मनेता, कलाकार, विश्व विद्यालय के चांसलर्स, सभी अपने अपने विषयों में चर्चा करके स्तंभित रह जाते हैं. समाधान की रोशनी में बाबाजी भारत के विख्यात आयुर्वेद विद्या के चिकित्सक हैं. सम्पूर्ण भारत से तथा विदेशों से निराश होकर लौटे असाध्य रोगी उनके पास आते हैं और आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों की चिकित्सा से मृत्यु के द्वार तक पहुंचे रोगी भी ठीक हो जाते हैं मै स्वयं इसका उदाहरण हूँ. बाबाजी ने 'समग्र चिकित्सा ज्ञान विज्ञान' की एक नई अवधारणा दी है, जिसे विश्व सम्मलेन में भारतीय डॉक्टरों ने प्रस्तुत किया'।


वे वैज्ञानिकों में सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक, धर्मनेता, चिन्तक, दर्शक,वेदज्ञ, कलाकार,कवि और भारत का एक सामान्य औसत किसान सब एक साथ हैं. स्वभाव में सरल, साहसी, स्वावलंबी, दुनिया में किसी के विरोध की परवाह न करने वाले अस्तित्वदर्शी, जीवन विद्या के मर्मज्ञ, परम सत्य के रूप में ईश्वर को पहचानते हुए एक महापुरुष हैं. उनका कोई साधू वेश नहीं है. वे बिलकुल सादगी से भारत के आम आदमी की तरह रहते हैं.प्रयोजन होने पर सम्पूर्ण से भारत में भ्रमण करते हैं,शेष समय अमरकंटक. वे असामान्य रूप से सामान्य, बिना साधुवेश के अस्तित्वदर्शी, ज्ञानावतार व एक शांत सर्वतोमुखी समाधानकारी व्यक्ति हैं.


(संकलित)

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